कविता मनुष्यता की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति है। अभिव्यक्ति भाषा-अधिगम और भाषा-शिक्षण का एक अनिवार्य पक्ष है, और कविता इस अभिव्यक्ति का सबसे संक्षिप्त, प्रभावशाली और सुंदर माध्यम है। जो बात कई पृष्ठों में कही जाती है, कविता उसे कुछ पंक्तियों में गहन संवेदना और अर्थ के साथ कह देती है। इसी विश्वास के साथ हमने इस सभा में विविध कविताओं को स्थान दिया।
इन कविताओं को चुनने का उद्देश्य केवल बच्चों में कविता के प्रति प्रेम जगाना नहीं था, बल्कि उनके माध्यम से समाज के महत्वपूर्ण प्रश्नों की ओर भी उनका ध्यान आकर्षित करना था। हाल के दिनों में हमने अनेक समाचार देखे, जहाँ हजारों करोड़ रुपये की लागत से बनी सड़कें और फ्लाईओवर पहली ही बारिश में ढह गए। हम हजारों करोड़ रुपये के घोटालों की बात करते हैं, जबकि इसी देश में असंख्य लोग ऐसे हैं जिन्हें दिन भर भटकने के बाद भी सौ रुपये कमाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। दूसरी ओर विभिन्न विभागों में मिलकर हजारों करोड़ रुपये का भ्रष्टाचार किया जा रहा है। इसी संदर्भ में अशोक चक्रधर जी की कविता भ्रष्टाचार का महोत्सव कविता को सभा में शामिल किया गया।
सबसे बड़े दुख की बात यह है कि हम ऐसी घटनाओं को सामान्य समाचार मानकर आगे बढ़ जाते हैं। हम भूल जाते हैं कि भ्रष्टाचार का प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव हर नागरिक के जीवन पर पड़ता है। हमारे विकास कार्य, हमारी सुविधाएँ और हमारे भविष्य सब इसकी कीमत चुकाते हैं।
सभा में हरिवंश राय बच्चन की कविता “एक नया अनुभव” भी प्रस्तुत की गई। इस कविता में एक चिड़िया कवि से पूछती है “क्या तुम मुझे जानते हो? क्या तुम्हें मेरे पंखों, मेरे जीवन और मेरे अस्तित्व का अनुभव है? यदि नहीं, तो तुम मेरे ऊपर कविता कैसे लिख सकते हो?” कवि उत्तर देता है “क्योंकि मैं तुमसे प्रेम करता हूँ।” इस पर चिड़िया कहती है—”शब्दों का प्रेम से क्या सरोकार?” यह कविता हमें बताती है कि प्रेम केवल शब्दों से नहीं, बल्कि संवेदना और अनुभव से जन्म लेता है। हमें पक्षियों से प्रेम होने का दावा है, लेकिन हम लगातार पेड़ काटते जा रहे हैं। हमारे शब्द और हमारे कर्म अक्सर एक-दूसरे के विपरीत खड़े दिखाई देते हैं। यह कविता बच्चों को इस अंतर्विरोध पर सोचने के लिए प्रेरित करती है।
एक अन्य कविता में एक बेटी अपने पिता से कहती है—”मुझे पढ़ना है।” उसकी एक पंक्ति—”मुझे एक नया धर्म बनाना है, बने हुए धर्मों को परखना है, इसलिए पढ़ना है।” बच्चों को स्वतंत्र चिंतन, प्रश्न करने की क्षमता और शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है।
सभा में मंगलेश डबराल की प्रसिद्ध कविता “वर्णमाला” का भी पाठ किया गया। इस कविता में वर्णमाला के अक्षरों को आज के सामाजिक यथार्थ से जोड़ते हुए अत्यंत अर्थपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया है। भाषा यहाँ केवल अक्षरों का क्रम नहीं रह जाती, बल्कि हमारे समय, समाज और जीवन का दस्तावेज़ बन जाती है। हमारे विद्यार्थी ने इस कविता का अत्यंत भावपूर्ण, सटीक उतार-चढ़ाव और प्रभावशाली वाचन के साथ पाठ किया, जिसने श्रोताओं पर गहरा प्रभाव छोड़ा।
सभा में युवा कवि प्रदीप की कविता “यह उदास लोगों की पीढ़ी है” का भी पाठ किया गया। यह कविता घरेलू हिंसा जैसे संवेदनशील और अक्सर अनदेखे रह जाने वाले विषय पर प्रश्न उठाती है। यह बच्चों को यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि किसी भी रिश्ते की बुनियाद भय या अधिकार नहीं, बल्कि प्रेम, सम्मान और संवाद होना चाहिए।
मैं सदैव ऐसी कविताएँ चुनने का प्रयास करती हूँ जो बच्चों को केवल भाषा ही न सिखाएँ, बल्कि उन्हें अधिक संवेदनशील, विचारशील और मानवीय भी बनाएँ। मेरा मानना है कि साहित्य का अर्थ ही सरोकार है। जो कविता या रचना मनुष्यता, संवेदना और सामाजिक चेतना की बात नहीं करती, जो मनुष्य को अधिक सजग और अधिक मानवीय नहीं बनाती, वह अपने उद्देश्य को पूर्ण नहीं कर सकती। बच्चों ने इन सभी कविताओं का अत्यंत आनंद, आत्मीयता और समर्पण के साथ पाठ किया। एक शिक्षक के रूप में इस पूरी प्रक्रिया में उनके साथ काम करना मेरे लिए अत्यंत संतोष और आनंद का अनुभव रहा। यह केवल कविताओं का पाठ नहीं था, बल्कि भाषा के माध्यम से संवेदना, प्रश्न और मनुष्यता की ओर बढ़ाया गया एक सार्थक कदम था।
कविताएँ
- भ्रष्टाचार का महोत्सव
- एक नया अनुभव
- क्योंकि मैं लड़की हूँ मुझे पढ़ना है
- वर्णमाला
- यह उदास लोगों की पीढ़ी है