कक्षा 10 के विद्यार्थियों ने हाल ही में आयोजित प्रार्थना सभा में “कविता, किताबें और रंगमंच” विषय पर एक संवेदनशील और विचारोत्तेजक प्रस्तुति दी। सभा में कविता, जनगीत, पुस्तक समीक्षा और नाटक के माध्यम से विद्यार्थियों ने समाज, समानता, पहचान और मानवीय संवेदनाओं से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रश्नों को सामने रखा।
सभा की शुरुआत द्वारा जनकवि गोरख पांडेय के प्रसिद्ध जनगीत “गुलमिया, अब हम नाहीं बजइबो” की सुंदर प्रस्तुति से हुई। गीत को केवल संगीत के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और विरोध की एक सशक्त आवाज़ के रूप में प्रस्तुत किया गया। विद्यार्थियों ने Blowin’ in the Wind, We Shall Overcome और Hum Dekhenge जैसे गीतों का उदाहरण देते हुए बताया कि किस तरह संगीत और गीत समय-समय पर अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने और बदलाव की प्रेरणा देने का माध्यम बने हैं।
इसके बाद निवेदिता ने अपनी कविता “मतभेद” प्रस्तुत की। कविता के माध्यम से मतभेदों, विचारों की विविधता और उन्हें समझने की आवश्यकता पर विचार करने का अवसर मिला। इसके साथ ही विधा ने स्वरचित कविता ‘क्षितिज’ का सुंदर पाठ किया ।
असगर वजाहत द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘रानू में क्या जानूँ’ की एक कहानी पर आधारित नाटक प्रस्तुत किया गया। नाटक में मुख्य भूमिकाएँ आरिका, क्रपा, कृदय, थेया, गतिक, जय और जयदित्य ने निभाईं।
नाटक का मुख्य उद्देश्य लिंग के आधार पर किए जाने वाले भेदभाव पर प्रश्न उठाना था। इसमें यह सवाल उठाया गया कि घर के काम-काज क्या केवल लड़कियों के लिए होते हैं, या ये जीवन जीने के आवश्यक कौशल हैं, जिन्हें लड़कों को भी सीखना चाहिए और जो आगे चलकर उनके भी काम आ सकते हैं।
नाटक में रानू कई मासूम लेकिन बेहद महत्वपूर्ण सवाल पूछता है—“माँ ही आपको खाना क्यों परोसती हैं? आप खाना क्यों नहीं परोसते? आप हर दिन आकर सोफ़े पर क्यों पड़ जाते हैं और माँ से चाय बनाने के लिए कहते हैं? माँ कभी थकती नहीं हैं क्या? क्या वह सुपरवुमन हैं?”
वह यह भी सवाल करता है कि उसकी दीदी को ही सिलाई, बुनाई, कढ़ाई और चित्रकारी क्यों सिखाई जाती है, उसे क्यों नहीं। अपनी मासूमियत के माध्यम से रानू सदियों से चली आ रही सामाजिक धारणाओं, रूढ़ियों और प्रथाओं पर सवाल उठाता है—“दीदी हमेशा चाय क्यों बनाती है? मैं क्यों नहीं?”
रानू का दोस्त सनी है, जिसके घर में सभी लोग मिल-जुलकर घर के काम करते हैं। रानू को यह जानकर आश्चर्य होता है कि सनी के पिताजी को रोटी बनाना भी आता है।
इन सभी सवालों के माध्यम से नाटक भारतीय समाज में महिलाओं और लड़कियों पर थोपे जाने वाले घरेलू कामों और उनसे जुड़ी लैंगिक धारणाओं को चुनौती देता है। नाटक हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या घर के काम केवल लड़कियों के होते हैं, या ये ऐसे जीवन-कौशल हैं जिन्हें हर व्यक्ति को सीखना चाहिए?
पुस्तक समीक्षा -
अनुराधा बेनीवाल लंदन में रहने वाली एक भारतीय शतरंज खिलाड़ी हैं, जिन्होंने यात्रा-वृत्तांत ‘लोग जो मुझमें रह गए’ लिखा है। यह उनकी पहली यात्रा-पुस्तक ‘आज़ादी मेरा ब्रांड’ की अगली कड़ी है।
उनकी पुस्तक यूरोप और एशिया के कुछ हिस्सों की यात्राओं के अनुभवों को प्रस्तुत करती है। अपनी यात्राओं के माध्यम से वे पहचान, स्त्रीत्व, मानवीय जुड़ाव आदि जैसे विषयों को तलाशती हैं। यह पुस्तक संस्कृति और विरासत पर एक टिप्पणी है, जिसमें वे हमारी संस्कृति, परंपराओं, विश्वासों और भाषा के साथ समानताएँ खोजती हैं।
सरल भाषा का प्रयोग करते हुए वे कई सार्थक संदेश देती हैं। हरियाणा के एक छोटे से शहर में जन्मी और पली-बढ़ी अनुराधा अपने समुदाय के साथ-साथ भारत के विभिन्न समुदायों से भी संवाद करती हैं और दुनिया भर की अलग-अलग संस्कृतियों के प्रति जागरूकता पैदा करती हैं। यह एक सरल, लेकिन विचारोत्तेजक पुस्तक है, जो हमारे मन में कई सवाल उठाती है, जैसे—
“हिंदी जैसी व्यापक रूप से बोली जाने वाली भाषा में लिंग के बारे में पर्याप्त शब्दावली क्यों नहीं है?”
“परंपरा और सामाजिक प्रगति एक साथ कैसे चल सकती हैं?”
“सही और गलत के बीच की रेखा कौन खींचता है?”
“खासकर महिलाओं को ही बार-बार अपने आपको समझाने की आवश्यकता क्यों पड़ती है?”
इस पुस्तक ने हमें नए लोगों से मिलने, दुनिया की यात्रा करने और विभिन्न विचारों को एक नई और ताज़ा दृष्टि से देखने का अवसर दिया।
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